 |
 |
 |
| |
|
» مطالب جدید سایت |
| بازدید ها : 243 |
- |
1 |
 |
 |
2 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ دهم دي
--------------
| بازدید ها : 1098 |
- |
15 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ سوم مرداد
--------------
| بازدید ها : 1113 |
- |
24 |
 |
 |
1 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ بيست و هفتم تير
--------------
| بازدید ها : 1669 |
- |
29 |
 |
 |
12 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و نهم بهمن
--------------
| بازدید ها : 848 |
- |
37 |
 |
 |
6 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هفدهم بهمن
--------------
| بازدید ها : 724 |
- |
14 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ چهارم بهمن
--------------
| بازدید ها : 813 |
- |
34 |
 |
 |
1 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هجدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 1200 |
- |
25 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ سيزدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 2929 |
- |
54 |
 |
 |
17 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ سيزدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 1182 |
- |
12 |
 |
 |
12 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ دوازدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 2625 |
- |
39 |
 |
 |
10 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هفتم آذر
--------------
| بازدید ها : 1818 |
- |
91 |
 |
 |
9 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ چهارم آذر
--------------
| بازدید ها : 1158 |
- |
10 |
 |
 |
6 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و هفتم آبان
--------------
| بازدید ها : 1715 |
- |
19 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و پنجم آبان
--------------
| بازدید ها : 2049 |
- |
194 |
 |
 |
9 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و پنجم آبان
--------------
| بازدید ها : 820 |
- |
11 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ پانزدهم تير
--------------
| بازدید ها : 10447 |
- |
83 |
 |
 |
44 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ هفتم اسفند
--------------
| بازدید ها : 3103 |
- |
40 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ ششم اسفند
--------------
| بازدید ها : 556 |
- |
9 |
 |
 |
2 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ ششم اسفند
--------------
| بازدید ها : 1899 |
- |
6 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ بيست بهمن
--------------
|
| |
|
|
 |
 |
 |
|
سهراب سپهری
:
دیاری دیگر
میان لحظه و خاك، ساقه گرانبار هراسی نیست.
همراه! ما به ابدیت گل ها پیوسته ایم.
تابش چشمانت را به ریگ و ستاره سپار:
تراوش رمزی در شیار تماشا نیست.
نه در این خاك رس نشانهی ترس
و نه بر لاجورد بالا نقش شگفت.
در صدای پرنده فروشو:
اضطراب بال و پری سیمای ترا سایه نمی كند.
در پرواز عقاب
تصویر ورطه نمی افتد.
سیاهی خاری میان چشم و تماشا نمی گذرد.
و فراتر:
میان خوشه و خورشید
نهیب داس از هم درید.
میان لبخند و لب
خنجر زمان درهم شكست.
|
|