 |
 |
 |
| |
|
» مطالب جدید سایت |
| بازدید ها : 238 |
- |
1 |
 |
 |
2 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ دهم دي
--------------
| بازدید ها : 1098 |
- |
15 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ سوم مرداد
--------------
| بازدید ها : 1113 |
- |
24 |
 |
 |
1 |
|
تاریخ : ۱۳۸۷ بيست و هفتم تير
--------------
| بازدید ها : 1669 |
- |
29 |
 |
 |
12 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و نهم بهمن
--------------
| بازدید ها : 847 |
- |
37 |
 |
 |
6 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هفدهم بهمن
--------------
| بازدید ها : 724 |
- |
14 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ چهارم بهمن
--------------
| بازدید ها : 813 |
- |
34 |
 |
 |
1 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هجدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 1200 |
- |
25 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ سيزدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 2929 |
- |
54 |
 |
 |
17 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ سيزدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 1182 |
- |
12 |
 |
 |
12 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ دوازدهم آذر
--------------
| بازدید ها : 2624 |
- |
39 |
 |
 |
10 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ هفتم آذر
--------------
| بازدید ها : 1818 |
- |
91 |
 |
 |
9 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ چهارم آذر
--------------
| بازدید ها : 1158 |
- |
10 |
 |
 |
6 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و هفتم آبان
--------------
| بازدید ها : 1715 |
- |
19 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و پنجم آبان
--------------
| بازدید ها : 2049 |
- |
194 |
 |
 |
9 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ بيست و پنجم آبان
--------------
| بازدید ها : 819 |
- |
11 |
 |
 |
3 |
|
تاریخ : ۱۳۸۶ پانزدهم تير
--------------
| بازدید ها : 10441 |
- |
83 |
 |
 |
44 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ هفتم اسفند
--------------
| بازدید ها : 3103 |
- |
40 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ ششم اسفند
--------------
| بازدید ها : 556 |
- |
9 |
 |
 |
2 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ ششم اسفند
--------------
| بازدید ها : 1899 |
- |
6 |
 |
 |
5 |
|
تاریخ : ۱۳۸۵ بيست بهمن
--------------
|
| |
|
|
 |
 |
 |
|
فروغ فرخزاد
:
گناه
گنه كردم گناهی پر ز لذت
كنار پیكری لرزان و مدهوش
خداوندا چه می دانم چه كردم
در آن خلوتگه تاریك و خاموش
در آن خلوتگه تاریك و خاموش
نگه كردم بچشم پر ز رازش
دلم در سینه بی تابانه لرزید
ز خواهش های چشم پر نیازش
در آن خلوتگه تاریك و خاموش
پریشان در كنار او نشستم
لبش بر روی لب هایم هوس ریخت
زاندوه دل دیوانه رستم
فرو خواندم بگوشش قصهی عشق:
ترا می خواهم ای جانانهی من
ترا می خواهم ای آغوش جانبخش
ترا, ای عاشق دیوانهی من
هوس در دیدگانش شعله افروخت
شراب سرخ در پیمانه رقصید
تن من در میان بستر نرم
بروی سینه اش مستانه لرزید
گنه كردم گناهی پر ز لذت
در آغوشی كه گرم و آتشین بود
گنه كردم میان بازوانی
كه داغ و كینه جوی و آهنین بود
|
|